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बात
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बात—यह छोटा-सा शब्द है, पर इसका संसार बड़ा ही व्यापक है। मनुष्य की पहचान उसके कर्म से होती है, पर उसकी कद्र उसकी बात से होती है। कहा भी गया है— “बात से बात बनती है और बात से ही बिगड़ती है।” यही बात कभी स्नेह का सेतु बन जाती है तो कभी वैर का वज्र। पौराणिक कथाओं में वाणी की शक्ति को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। महर्षि दुर्वासा के क्रोध की “बात” ने इंद्रलोक को संकट में डाल दिया था, वहीं श्रीकृष्ण की मीठी वाणी ने कुरुक्षेत्र के रण में धर्म का मार्ग दिखाया। “वाणी वह फूल है जिससे मनुष्य की सुगंध फैलती है।” यही कारण है कि कहा जाता है— “मीठी वाणी से पत्थर भी पिघल जाते हैं।” हमारे लोकजीवन में बातों का बड़ा महत्व है। गाँव की चौपाल हो या नगर का सभागार—बातों से ही संबंधों के धागे बुने जाते हैं। कभी-कभी “बात का बतंगड़” बनाकर लोग व्यर्थ का झगड़ा खड़ा कर देते हैं। जैसे— “बोली एक अनमोल है, जो बोले सो जान।” यदि बात सोच-समझकर कही जाए तो वह मरहम बन जाती है, और यदि आवेश में कही जाए तो तीर की तरह हृदय को बेध देती है। कहावत है— “पहले तोल, फिर बोल।” यह कहावत जीवन का अमूल्य सूत्र है। आज के युग में जब लोग बि...