1. " वेतन की राह तकते हैं, हर दिन नई आस जगाते हैं, ज्ञान की रोशनी फैलाते हुए, खुद अंधेरों में डूब जाते हैं। समय पर वेतन जो ना मिले, मन में पीड़ा गहराती है, बच्चों को मुस्कान देने वाले, खुद तन्हाई में खो जाते हैं। घर की जिम्मेदारियों का भार, हर दिन जैसे बढ़ता जाए, खर्चों की अनसुनी पुकार, दिल को हर पल सताए। फिर भी हार नहीं मानते हैं, अपना कर्तव्य निभाते हैं, पर भीतर से ये प्रश्न उठता, हमारी मेहनत कब रंग लाए? --- 2. "वेतन की राहों में" शिक्षा के मंदिर में रोज़ जाते, ज्ञान का दीप जलाते हैं, पर वेतन की राहों में अक्सर, हम खुद को बेसहारा पाते हैं। मेहनत का फल जो ना मिले, जीवन की डोर खिंचती है, बच्चों के सपनों को संवारते, हमारी उम्मीदें टूटती हैं। घर की जरुरतें, खर्च बेहिसाब, मन को बेचैन करते हैं, पर हौसला फिर भी रखते हैं, हम अपना फर्ज निभाते हैं। वेतन की ये देर हमें सताए, पर हमारी सेवा न रुक पाए, एक दिन ये कठिनाई भी बीतेगी, हमारी मेहनत जरूर रंग लाएगी। --- 3. "मेहनत की कीमत" रोज़ कक्षा में जाते हैं हम, ज्ञान की बगिया खिलाते हैं हम, पर वेतन की बिन मौसम बारिश, हमारी उम...