फूफा जी की इज्जत (हास्य व्यंग्य)

 यह जानना कि आप फूफा की गति को प्राप्त हो चुके ,बड़ा आसान है।जब आपकी वो सालियां जो कभी आपके घने बालों पर रीझी रहती थी आपको सर में प्याज़ का रस पोतने की बिना माँगी सलाह देने लग जाएँ ,जब आप सीढ़ियाँ चढ़ रहे हो और सलहज आपके दुखते घुटनों का वास्ता देकर अपने लड़के को सहारा देने भेज दें। जब आपकी मौजूदगी को नज़रअंदाज़ कर साले अनमने भाव से टीवी मे घुस जाएँ।जब ससुराल में आपके आने की खबर के बावजूद नया क्राकरी सैट ना निकाला जाये अलमारी से।जब ससुराल में आपकी थाली से पनीर ग़ायब हो जाये ,उसमें केवल पालक के दर्शन हो।यह सब घटा हो आपके साथ तो दुखी ना हों।मान लीजिए आप जीजा की कुर्सी से धकेले जा चुके और अब फूफा करार दे दिए गए हैं।हिम्मत रखिए।ये प्राकृतिक आपदा है। होनी है। होकर रहती है।दरअसल ये कलपने के बजाय मन को समझाने का वक्त है।


सब चक्कर मन का ही है।मन समझाये से नहीं समझता।वो जीजा के ऊँचे सिंहासन से उतरने को तैयार होता ही नहीं।पर आपकी इज़्ज़त इसी में है कि आप पूरी गंभीरता और शालीनता से नीचे उतर आयें।ऐसा नहीं करेंगे आप तो धकियाये जाएँगे।घुटने छिल जाएँगे।जगहँसाई होगी।हर आदमी हमेशा मुख्य अतिथि नहीं बना रह सकता ,उसे एक ना एक दिन मंच से उतर कर दर्शकों में बैठना ही होता है।


फूफा उस बुढ़ाते नेता की तरह होता है जो वक्त की नज़ाकत नहीं समझ पाता।उसे लगता है कि जनता अंधी है और हमेशा उसके पीछे चलती रहेगी।पर ऐसा होता कहाँ है ? कोई नया नेता परिदृश्य में चला आता है ,वो उससे भी बेहतर बातें करता है ,उम्मीदें जगाता है और पब्लिक उस पर फ़िदा हो लेती है।पुराने नेता मानते नहीं।चुनाव लड़ते हैं और अपनी ज़मानत और रही सही इज़्ज़त दोनों खो देते हैं।


जीजा और फूफा में ज़मीन आसमान का फ़र्क़ है। रणवीर कपूर और गोविंदा जैसा अंतर है ये।जिसकी फ़िल्में धडाधड हिट हो रही हो वो जीजा और जिसकी शकल केवल कपिल शर्मा के शो में ही दिखे वो फूफा।गोविन्दा लाख जतन कर लें वो रणवीर कपूर को हरा नहीं सकता।ऐसे में जीजा को आशीर्वाद देकर साइड रोल करने में ही अक़्लमंदी है।


फूफा होते ही आपको चाहिये की ससुरालियो को बिना माँगे सलाह देना बंद कर दें।अकेले और अचानक ससुराल जाने की गलती ना ही करें तो बेहतर।ससुराल जाना पड़ ही जाये तो किसी से आगे पीछे घूमने की उम्मीद ना रखें ।सुने ज़्यादा और बोलें कम।वैसे भी इन दिनों बोलने बताने को ज़्यादा कुछ रह नहीं जाता।वो श्रोता जो कभी आपको मंत्र मुग्ध होकर सुनते थे ,वो मौक़े पर होते ही नहीं अब।होते भी हैं तो उन्हे कम सुनाई देने लगता है ! जो कुछ भी कहें उसे लेकर सभी से रज़ामंदी की उम्मीद ना रखें।ख़ासकर उस बंदे से ,जो आपको अपदस्थ करके जीजा हुआ है ,बहस करने से बचे। ख़ासकर अपनी राजनीतिक समझ अपने पास रखें।यह मान लें कि परामर्श मंडल में हैं आप और आपका काम राय देने से ज़्यादा सुनने का है।कम खायें ,वैसे भी खाने को कुछ ख़ास होता नही थाली में।और हो भी तो आपका अपना पेट आपके हाथ जोड़ने लगता है।ऐसे में ग़म खाएँ।अनमने होने से बचें।अपने आने जाने की टिकट खुद करवा कर आयें ,ससुराल वालों पर यही ज़ाहिर करें कि आप अब भी भारी व्यस्त हैं और जितनी जल्दी हो मैदान छोड़ दें।


फूफा ,इज़्ज़त करवाने की नही ,इज़्ज़त बचाने की अवस्था है।इतनी सी बात ध्यान रखेंगे तो आपकी बात बनी रह जाएगी 

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