1.  ।।श्री काशी विश्वनाथ अष्टकम्।।वाचामगोचरमनेक गुण स्वरूपं|

वागीश विष्णु सुर सेवित पाद पद्मं|

वामेण विग्रह वरेन कलत्रवन्तं|

वाराणसी पुरपतिं भज विश्वनाधं ।।

वाचामगोचरमनेक गुण स्वरूपं|

वागीश विष्णु सुर सेवित पाद पद्मं|

वामेण विग्रह वरेन कलत्रवन्तं|

वाराणसी पुरपतिं भज विश्वनाधं ।।

भूतादिपं भुजग भूषण भूषिताङ्गं|

व्याघ्राञ्जिनां बरधरं, जटिलं, त्रिनेत्रं|

पाशाङ्कुशाभय वरप्रद शूलपाणिं|

वाराणसी पुरपतिं भज विश्वनाधं ।।

सीतांशु शोभित किरीट विराजमानं|

बालेक्षणातल विशोषित पञ्चबाणं|

नागाधिपा रचित बासुर कर्ण पूरं|

वाराणसी पुरपतिं भज विश्वनाधं ।।

सीतांशु शोभित किरीट विराजमानं|

बालेक्षणातल विशोषित पञ्चबाणं|

नागाधिपा रचित बासुर कर्ण पूरं|

वाराणसी पुरपतिं भज विश्वनाधं ।।

पञ्चाननं दुरित मत्त मतङ्गजानां|

नागान्तकं धनुज पुङ्गव पन्नागानां|

दावानलं मरण शोक जराटवीनां|

वाराणसी पुरपतिं भज विश्वनाधं ।।

तेजोमयं सगुण निर्गुणमद्वितीयं|

आनन्द कन्दमपराजित मप्रमेयं|

नागात्मकं सकल निष्कलमात्म रूपं|

वाराणसी पुरपतिं भज विश्वनाधं ।।

आशां विहाय परिहृत्य परश्य निन्दां|

पापे रथिं च सुनिवार्य मनस्समाधौ|

आधाय हृत्-कमल मध्य गतं परेशं|

वाराणसी पुरपतिं भज विश्वनाधं ।।

रागाधि दोष रहितं स्वजनानुरागं|

वैराग्य शान्ति निलयं गिरिजा सहायं|

माधुर्य धैर्य सुभगं गरलाभिरामं|

वाराणसी पुरपतिं भज विश्वनाधं। 

वाराणसी पुर पते स्थवनं शिवस्य|

व्याख्यातं अष्टकमिदं पठते मनुष्य|

विद्यां श्रियं विपुल सौख्यमनन्त कीर्तिं|

सम्प्राप्य देव निलये लभते च मोक्षं।

विश्वनाधाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेः शिव सन्निधौ|

शिवलोकमवाप्नोति शिवेनसह मोदते।।


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