मोह: एक भाव, एक बंधन



मोह वह मानसिक अवस्था है जो व्यक्ति को उसके स्वाभाविक ज्ञान और विवेक से दूर करता है। यह मनुष्य को उन वस्तुओं, व्यक्तियों या परिस्थितियों के प्रति अत्यधिक आकर्षित कर देता है, जिनसे वह स्वयं को अलग नहीं कर पाता। मोह मनुष्य के लिए एक मायावी जाल है, जो उसे अपनी इच्छाओं और लालसाओं में बाँधकर रखता है। इस निबंध में मोह पर कहावतों, मुहावरों, अन्तर्कथाओं और कविताओं के माध्यम से प्रकाश डाला जाएगा।


मोह का आरंभ मनुष्य के जीवन में बाल्यकाल से ही हो जाता है। बचपन में खिलौनों के प्रति मोह, युवावस्था में सुख-सुविधाओं और प्रेम के प्रति मोह, और वृद्धावस्था में सम्मान और धन के प्रति मोह—यह चक्र निरंतर चलता रहता है। एक प्रसिद्ध कहावत है, "मोह माया बड़ी बलवानी", जिसका अर्थ है कि मोह और माया बहुत शक्तिशाली होती हैं और इनके प्रभाव से बच पाना कठिन होता है।


महाभारत की कथा में हमें इस कहावत का सजीव उदाहरण मिलता है। द्रौपदी के चीरहरण के समय जब महात्मा भीष्म, जिनके पास अपार ज्ञान और धर्मबोध था, कुछ नहीं कर सके। उनका मौन मोह का परिणाम था, क्योंकि वे कौरवों के प्रति अपने कर्तव्यों से बँधे थे। यह घटना हमें यह सिखाती है कि जब हम मोह के बंधन में होते हैं, तब सत्य और धर्म की राह पर चलना कठिन हो जाता है।


एक अन्य मुहावरा है, "मोह में अंधा होना", जो बताता है कि मोह व्यक्ति के विवेक और दृष्टिकोण को धुंधला कर देता है। राजा हरिश्चंद्र की कहानी भी इसी का एक उदाहरण है। हरिश्चंद्र ने सत्य के मार्ग पर चलते हुए अपनी पत्नी और पुत्र को भी दास के रूप में बेच दिया, लेकिन उनका मोह सत्य के प्रति इतना प्रबल था कि उन्होंने इस मार्ग से विचलित नहीं होने दिया। यद्यपि उनके सत्य का मोह प्रशंसनीय था, यह कहानी हमें यह भी सिखाती है कि मोह किसी भी रूप में हो, वह मनुष्य को बंधन में डाल सकता है।


कबीर के दोहों में भी मोह की चर्चा प्रमुखता से मिलती है। कबीर कहते हैं:


"माया मरी न मन मरा, मरि मरि गया शरीर। आसा तृष्णा न मरी, कहि गया दास कबीर॥"


कबीर यहाँ इस बात पर जोर देते हैं कि माया, जो मोह का ही रूप है, तब तक समाप्त नहीं होती जब तक मनुष्य अपनी इच्छाओं और तृष्णाओं से मुक्त नहीं होता। शरीर की मृत्यु हो सकती है, लेकिन यदि मन और मोह जीवित हैं, तो वास्तविक मुक्ति नहीं मिल सकती।


मोह के परिणामस्वरूप व्यक्ति को जीवन में कई कष्टों का सामना करना पड़ता है। यह हमें उस जाल में फँसा देता है जिससे बाहर निकलना कठिन हो जाता है। इसी संदर्भ में एक और मुहावरा प्रचलित है, "मोह का जाल तोड़ना", जिसका अर्थ है मोह से मुक्त होकर अपनी स्वाभाविक स्थिति को पुनः प्राप्त करना। यह मुहावरा गीता के उस उपदेश की याद दिलाता है जो श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिया था। जब अर्जुन मोहवश अपने संबंधियों के प्रति दया भाव से युद्ध नहीं करना चाहते थे, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें बताया कि यह मोह अस्थायी और अज्ञान का परिणाम है। जीवन का वास्तविक उद्देश्य आत्मा की उन्नति और कर्म के पथ पर चलना है, न कि मोह के बंधनों में फँसना।


एक अन्तर्कथा से यह भी समझ सकते हैं कि कैसे मोह व्यक्ति के पतन का कारण बन सकता है। एक व्यक्ति ने एक कबूतर को पकड़ा और उसे अपने साथ घर ले आया। कबूतर के प्रति उसका मोह इतना बढ़ गया कि वह उसे सोने के पिंजरे में रखने लगा, लेकिन वह कबूतर स्वतंत्रता चाहता था। अंततः मोह के कारण वह व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता और स्वाभाविक जीवन को खो बैठा। इस कथा से यह संदेश मिलता है कि मोह चाहे कितना भी आकर्षक हो, वह अंततः नुकसानदायक हो सकता है।


अंत में, मोह से मुक्ति पाने का मार्ग तभी संभव है जब व्यक्ति अपने भीतर के सत्य को पहचानता है और अस्थायी इच्छाओं और आकर्षणों से दूर रहता है। प्रसिद्ध कवि हरिवंश राय बच्चन ने भी मोह पर अपनी कविता में कहा है:


"मोह की गहन घाटियों में, खो जाता है जीवन। जब तक मोह का त्याग न हो, मुक्ति नहीं है संभव॥"


इस कविता के माध्यम से बच्चन जी यह स्पष्ट करते हैं कि मोह की गहराई में डूबे हुए व्यक्ति को जीवन की सच्ची स्वतंत्रता नहीं मिल सकती। जब तक वह मोह को त्याग नहीं करता, तब तक जीवन के सही अर्थ को नहीं समझ सकता।


निष्कर्ष: मोह एक जटिल भाव है जो मनुष्य को भौतिक और मानसिक बंधनों में जकड़ कर रखता है। कहावतें, मुहावरे, कथाएँ और कविताएँ इस भाव के विविध रूपों को उजागर करती हैं। मोह से मुक्ति का मार्ग आत्मबोध और सत्य के अनुसरण में ही निहित है। जब तक मनुष्य अपने मन के मोहजाल को नहीं तोड़ता, तब तक वह सच्ची शांति और स्वतंत्र

ता का अनुभव नहीं कर सकता।


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