गुरु-शिष्य परंपरा बदलते परिदृश्य

 

प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान 

सर्वोच्च रहा है।जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में गुरु की उपयोगिता से हम इंकार नहीं कर सकते।गुरु-शिष्य परम्परा हमारी स्वस्थ एवं सभ्य भारतीय संस्कृति का परिचायक रही है।बिना गुरु के जीवन के गूढ़ रहस्यों का उद्घाटन,प्रवल जिज्ञासाओं का शमन एवं ज्ञान का प्रकाश संभव नहीं है। 

वैदिक काल में गुरु आश्रमों की परम्परा थी।एक आयु विशेष पर शिक्षार्थियों एवं शिष्यों को अपना घर त्याग कर गुरु आश्रम में ही रहना पड़ता था।शिक्षा व्यवस्था आज से कुछ भिन्न थी।एक वर्गविशेष के छात्र ही शिक्षा ग्रहण करने के पात्र हुआ करते थे।जिसके उदाहरण हमें इतिहास एवं ग्रंथों में आज भी मिलते हैं। 

गुरु का उत्तरदायित्व भी आज से कहीं अधिक एवं चुनौती 

पूर्ण था। शिष्य के शारीरिक, मानसिक शैक्षणिक,बौद्धिक 

एवं व्यावहारिक विकास आदि का समस्त उत्तरदायित्व गुरु पर ही था।उसे ज्ञानवान बनाना,चरित्रवान बनाना,बलवान बनाना, कुशल योद्धा बनाना,तार्किक एवं बौद्धिक बनाना,कुशल राजनैतिक बनाना सब कुछ गुरु पर ही निर्भर होता था।शिष्य अर्थात शिक्षार्थी भी समस्त राज वैभव की विलासिता त्याग कर गुरु आश्रम में एक तपस्वी की तरह ब्रह्मचर्य व्रत का पालन 

करते थे और विद्याध्ययन करते थे। 

परिवर्तन प्रकृति का अनिवार्य एवं शाश्वत नियम है।युग 

बदले,परिस्थितियाँ बदलीं,समय बदला,मान्यतायें बदलीं 

और समय के साथ-साथ आवश्यकतायें एवं मर्यादायें 

भीं बदलीं।आधुनिक युग में शिक्षा केवल धनोपार्जन या 

जीवकोपार्जन का साधन मात्र बनकर रह गयी है।आज शिक्षा को व्यावसायिक बना दिया गया है।शिक्षा का वास्तविक उपयोग 

उसे चरित्रवान,ज्ञानवान,देश का सच्चा नागरिक बनाना न होकर उसे व्यावसायिक बनाना हो गया है। 

शिक्षा पर बाजारवाद हावी हो गया है।गुरु परम्परा लगभग 

समाप्त हो चुकी है।गुरु शिष्य सम्बन्धों में गिरावट आई है।अब गुरु की आज्ञा का आँख बंद कर पालन करने वाले शिष्य नहीं 

रहे।गुरु एवं शिक्षकों का भी चारित्रिक पतन हुआ है।वर्तमान में शिक्षक और शिक्षार्थी में अर्थ और स्वार्थ हावी हो गया है। सच्चा गुरु वही है जो शिष्य के अज्ञान को समाप्त कर ज्ञान का प्रकाश भर दे।अज्ञान के घोर अंधकार को नष्ट कर ज्ञान के 

अगणित दीप प्रज्वलित कर दे। 

जीवन में हम जिससे भी कुछ सीखते हैं वह हमारे लिये गुरु ही है। 

गुरु के महत्व का वर्णन करते हुये संत कवि कबीर दास 

जी कहते है :-- 

“गुरु गोविंद दोऊ खड़े,काके लागूँ पाँय। 

बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय।” 

अर्थात कहने का भाव यह है कि जीवन में गुरु का महत्व 

ईश्वर से भी अधिक है,क्योंकि ईश्वर का परिचय तो गुरु ही 

करबाता है।ईश्वर तक पहुँचने का मार्गतो गुरु ही बताता 

है।अर्थात आशय यह है कि जीवन में गुरु की महक्ता सर्वोपरि है।यहाँ तक विद्वानों ने कहा है कि:-- 

“गुरूर ब्रह्मा,गुरूर विष्णु,गुरूर देवो महेश्वरा। 

गुरू ही साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नम:।” 

अर्थात गुरू ही ब्रह्मा,गुरू ही विष्णु और गुरु ही शंकर है। 

जब मनुष्य संसार में जन्म लेता है तब वह प्रत्येक वस्तु, 

व्यक्ति,दृश्य,पदार्थ यानि कि हर बात से अनभिज्ञ होता 

है।सबसे पहले उसे माँ ही सांसारिक जगत से परिचित करवाती है,इसलिये सबसे प्रथम गुरु तो माँ ही है और पिता भी। भारतीय संस्कृति के उन्नायक एवं युवाओं के सदैव प्रेरणा स्रोत स्वामी विवेका नंद जी ने कहा था :-- 

“तुम्हें कोई पढ़ा नहीं सकता। तुम्हें कोई आध्यात्मिक नहीं 

बना सकता।तुम्हें अन्दर से सीखना होगा।” 

अर्थात आत्मा ही सबसे श्रेष्ठ और सच्चा गुरु है। 

आज अपने माता-पिता सहित सभी आदरणीय गुरुजनों को सादर नमन करते हुये अपनी लेखनी को विराम देता हूं 

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