भीष्म प्रतिज्ञा

 

बचपन से पढ़ती सुनती आ रही थी कि भीष्म पितामह सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार करते हुए कई दिनों तक शरशय्या पर लेटे रहे।

लेकिन.....

वे भी क्या मेरी पीर की बराबरी कर सकते हैं?

मैं तो पैदा होते ही बिंधती आई हूं तलवार,बरछी, नश्तर से और बिंधती रहूंगी आखिरी सांस तक।

सुन सकोगे मेरी रामकहानी?

लछमी आई है -

कहती हुई दाई मां दरवाजे से बाहर निकल गई।

दादी,बुआ और दो पडोसनें बड़ी देर से किसी शुभ समाचार के लिए कान लगाकर खड़ी थीं मुंह लटकाकर निकलने लगीं लेकिन दादी से न रहा गया - तीसरी बार भी कोख में बेटी, मंगला की कोख ही खराब है।

मां अंदर कोठरी में मुंह पर कपड़े दबाए सिसक रही थी और मैं जनमते ही रोना भी भूल गई थी। बिहार के कस्बाई इलाके के जिस जाट परिवार में मैं जन्मी थी वहां बेटियों को मजबूरी में जिंदा रखा जाता है।

प्रसव के बाद न मां को पौष्टिक आहार नसीब हुआ और न मुझे पर्याप्त दूध, फिर भी पालने से लेकर डगमगाते हुए चलने का सफर तय कर लिया था।

विपदा के जनमते ही पापा ने दोनों बड़ी बेटियों को प्राइवेट स्कूल से निकाल कर सरकारी स्कूल‌ में डाल दिया था।

बड़ी संपदा, दूसरी शुभदा और फिर मेरी बारी आने पर बुआजी ने नाम दिया -विपदा।

हां विपदा के बाद मां ने एक बेटे को जन्म दिया था और सभी उसकी देखभाल में पूरी तरह से रम गए थे।

संपदा बिल्कुल गोरी थी शुभदा का रंग थोड़ा सा दबा हुआ था लेकिन नैन-नक्श तीखे थे और मैं?

रंग भी सांवला, सूखी लकड़ी सा बदन कि फूंक मारो तो उड़ जाती।

शक्ल-सूरत अच्छी थी तो दोनों बहनें कॉलेज तक पहुंचते पहुंचते ब्याह गईं, मैं पढ़ने में जरूर अच्छी थी सो पोस्ट ग्रेजुएशन के बाद नौकरी ज्वाइन कर ली।

पापा रिटायर हो चुके थे और मां के लल्ला (छोटा भाई) दसवीं में तीन बार फेल होने के बाद आई टी आई में पढ़ने गए तो अपनी सहपाठी से शादी कर घर में बैठ गए। तीन गर्भपात ,चार प्रसव और अनगिनत तनावों को झेलकर मां स्वर्ग सिधार गई।

लकवाग्रस्त पिता की दवाइयां और घर के खर्चे का हिसाब करने के बाद जब भी मैं भावज को नए कपड़े या गहने लेकर टोकती तो एक छुरी सीने में घोंप दी जाती - दीदी को क्यों सुहाने लगा ? खुद सिंगार पटार करने नहीं मिला न।

अनुभवी पिता ने उन चोटों से बचाने की नाकाम कोशिश की; अपने मित्र के दुहाजू बेटे से मेरा रिश्ता कर दिया और सारी जमा पूंजी बेचकर भाई के लिए दूकान खोल दी।

लेकिन....

तीर-तलवार,भाले बर्छी तो जैसे मेरे ही लिए बने थे,पति नशे में धुत्त आते तो माथे में जैसे तीर घुस जाता और फिर जब उसी नशे में किसी दूसरी लड़की की सुंदरता का बखान सुनना पड़े तो लगता, एक दुधारी तलवार सीने के आर-पार हो गई।

चकरघिन्नी सी सारे घर का काम करके ऑफिस के लिए निकलते समय मुंह हाथ धोने के लिए साबुन उठाते ही, तलाकशुदा ननद नश्तर चुभा ही जाती-

भाभी चाहे पियर्स लगाओ या लक्स तुम्हारा चेहरा तो काला ही रहेगा।

पचास पार करते करते टीबी के मरीज होते ही पति में थोड़ा सा सुधार आया था लेकिन जब उनकी बीमारी को लेकर बेटे-बहू की त्योरियां चढ़ती देखीं तो स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर इस सेनेटोरियम का रुख किया।

अब शायद एक और तलवार सिर पर लटक रही है...पति की सांसों का अंत जो मेरे जैसी संस्कारी और निष्ठावान पत्नी को शायद भयंकर यातना दे।

किन्तु......

दर्दों के अहसास बहरे हुए हैं,

      भी मरहम लगाने लगे हैं।

       सौगंध है मुझे पितामह भीष्म की!

       मैंने भी उनकी सी भीषण प्रतिज्ञा कर रखी है कि इस तलवार के वार पर न रोऊंगी और न छटपटाऊंगी।

       इस कहानी की नायिका संस्कारों और नैतिकताओं के बंधन में जकड़ी हुई खुद के लिए संघर्ष नहीं कर सकी, लेकिन लगभग पांच सौ छियासी मिलियन महिलाओं में से दस बीस को भी समर्थन प्रदान कर सकेगी तो खुद को धन्य समझेगी।

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