महाराष्ट्र चुनाव
महाराष्ट्र चुनाव में कांग्रेस की भूमिका किसी खोए हुए सूरमा की तरह है, जो मैदान में तो उतरता है, पर अपना लक्ष्य भूल जाता है। कभी महाराष्ट्र की राजनीति में प्रभावी रही कांग्रेस आज खुद अपनी पहचान ढूंढ रही है। पार्टी के नेता मंच पर भाषण देने आते हैं, जैसे पुराने समय के किले की दीवारों पर लगे बेमानी बैनर हों। न तो उनमें पहले जैसा जोश दिखाई देता है और न ही विचारधारा का कोई स्पष्ट स्वरूप।
कांग्रेस के उम्मीदवार आज भी उसी पुरानी चमकती टोपी और खादी के कुर्ते के साथ मैदान में उतरते हैं, मानो जनता उनके प्रतीकों से प्रभावित हो जाएगी। "गांधी की विचारधारा" और "नेहरू की नीति" जैसे शब्द उनके भाषणों में गूंजते हैं, पर उन शब्दों के भीतर कोई वजन नहीं रह गया। जनता को देखकर लगता है कि उसे कांग्रेस से वैसे ही झूठे वादों की आदत हो गई है, जैसे किसी पुराने फ़िल्म के संवाद जो हर चुनाव में दुहराए जाते हैं।
वास्तव में, कांग्रेस का यह हश्र उस कहानी जैसा है, जिसमें वीरता का दावा करने वाले योद्धा के पास अब न तलवार बची है, न ढाल। आज कांग्रेस महाराष्ट्र में अपने ही अतीत की छाया बनकर रह गई है।
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