तोल-मोल कर बोल

तोल-मोल कर बोल

प्रत्येक बोला जाने वाला शब्द अनमोल होता हैं अतः इसका व्यय तोल-मोल कर करना उचित रहता है। कुछ लोग कभी भी, कुछ भी बोल देते है, उन्हें फर्क नहीं पड़ता कि उनकी कडवी बोली से सामने वाले को कितनी चोट पहुंचेगी। ये बोले गये शब्दों का जादूं ही है कि कोई शीघ्रता से दोस्त बन जाता है जबकि बिना सोचे समझे बोलने वाले से लोग किनारा कर लेते हैं। जो ताकत सकारात्मक शब्दों में होती है, वह नकारात्मक शब्दों में नहीं होती है। बोलने से पहले शब्दों को मन के भीतर की तराजू पर तोलकर, जिव्हा तक लाया जाना चाहिए। अगर जिव्हा पर नियंत्रण न रखा जाय तो वह कुछ भी अनर्थ कर जाती है और
इस संबंध में रहीम जी ने क्या खूब लिखा है-
रहिमन जिव्हा बावरी, कही गई सरग पाताल।
आपहु कही भीतर गई, जूती खात कपाल ।।
गलत बोले गये शब्दों के कारण आए दिन घर-परिवार, समाज और देश में लड़ाई-झगड़े, उपद्रव आदि होते रहते हैं। अगर हम अच्छा, सकारात्मक नहीं बोल सकते तो हमें ऐसे शब्द भी कदापि नहीं बोलने चाहिए जो सामने वाले के मन को चोट पहुंचाए, सुनकर वह क्रोधित हो जाए या उससे हमारे रिश्ते खराब हो जाए। हमारे भीतर के विचार अच्छे होंगे तभी हम अच्छा बोल पाएंगे। हम अपने तन-मन को स्वस्थ रखें क्योंकि स्वस्थ शरीर में ही मस्तिष्क स्वस्थ रह सकता है तथा स्वस्थ मस्तिष्क में ही स्वस्थ विचार.....। हमें अपने शब्दों को सभी के लिए औषधि बनाना है न कि उनसे किसी को घायल करना है।
शब्द-शब्द सब कोई कहे, शब्द के हाथ न पांव ।
एक शब्द औषधि करे, एक शब्द सौ घाव ।।
तो आइए, हम अभी खुदसे वादा करते है- तोल-मोल कर बोलने का.....

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